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रघुपति भजन संजीवन मूरी ,भगवद्भक्ति

 रघुपति भजन संजीवन मूरी ,भगवद्भक्ति

आइडियल इंडिया न्यूज़ 

इन्द्र जीत तिवारी निर्भीक,

 समाचार सम्पादक, वाराणसी 

           


सौ रोगों की एक दवा, भगवद्भक्ति, प्रस्तुति के माध्यम से हम आपको भजन महिमा बतायेगें, ये भजन महिमा रामचरितमानस के उत्तरकांड में कागभुशुण्डिजी ने गरुड़जी को बताई थी !

रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी ॥ एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं।

नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥ भावार्थः-श्री रघुनाथजी की भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवा के साथ लिया जाने वाला मधु आदि) है। इस प्रकार का संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जाएँ, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नों से भी नहीं जाते ॥

जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई॥

सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई॥

भावार्थः हे गोसाई! मन को निरोग हुआ तब जानना चाहिए, जब

हृदय में वैराग्य का बल बढ़ जाए, उत्तम बुद्धि रूपी भूख नित नई बढ़ती रहे और विषयों की आशा रूपी दुर्बलता मिट जाए॥

बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई॥ सिव अज सुक सनकादिक नारद।

जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद ॥ भावार्थः इस प्रकार सब रोगों से छूटकर जब मनुष्य निर्मल ज्ञान रूपी जल में स्नान कर लेता है, तब उसके हृदय में राम भक्ति छा रहती है। शिवजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, सनकादि और नारद आदि ब्रह्मविचार में परम निपुण जो मुनि हैं, ॥


सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा ॥


श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ॥ भावार्थ-हे पक्षीराज ! उन सबका मत यही है कि श्री रामजी के चरणकमलों में प्रेम करना चाहिए। श्रुति, पुराण और सभी ग्रंथ कहते हं कि श्री रघुनाथजी की भक्ति के बिना सुख नहीं है॥


कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा ॥ फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला ॥ भावार्थः-कछुए की पीठ पर भले ही बाल उग आवें, बाँझ का पुत्र भले ही किसी को मार डाले, आकाश मे बहुत प्रकार के

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