कुछ दे पाएं हम अपने आने वाले कल को
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(प्रियंका भोर, गाज़ियाबाद की कविता)
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शिव की जटाओ मे करती वास I
माँ गंगा आई धरा पर मिटाने सब की प्यास I।
पावन से भी पावन गंगा करती सबको पावन l
एक बूंद से जिसकी सारे पाप धुल जावन।।
देखा सब कुछ गंगा माँ के तट l
जात-पात, ऊच- नीच, पाखंड के कितने ही मड।
माँ की ममता मे न आया बदलाव।
मानव ने दिए माँ को कितने ही घाव।।
जिसकी करते हो पूजा।
इक कार्य उसके लिए और करो दूजा ।।
रखो स्वच्छ जल को, रखो स्वच्छ जल कोl
कुछ दे पाए हम अपने आने वाले कल को l।

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