सफेदपोश गुंडागर्दी: हरदोई के स्कूल में महिला पत्रकार से बदसलूकी,
हाथ पकड़कर निकाला बाहर, बोले- 'अकेले में देख लेंगे'
बेनकाब हुए विकास के दावे: 5 साल का विकास पूछने पर भड़के प्रधानाध्यापक, कैमरे पर हमला और अकेले में देख लेने की धमकी
खाकी का दोहरा चेहरा: थाने पहुंची पीड़िता, तो पूछा गया उन्हीं से 'सवाल बिना परमिशन अंदर क्यों गईं?'
आइडियल इंडिया न्यूज़
अजय कुमार वर्मा,लखनऊ
जनपद हरदोई हाफ़िज़ खेड़ा के गाँव वालों के कहने पर मिड डे मील शौचालय शिक्षा व्यवस्था पर सवाल पूछने पहुंची रिपोर्टर ज़ैनब अक़िल खान .प्रिन्सिपल ने पत्रकार के साथ गाँव वालों को भी खदेड़ा |क्या वर्दी और पद की हनक इतनी बढ़ गई है कि वे महिला पत्रकार के साथ बदसलूकी और हाथापाई पर उतारू हो जाएं? यह एक गंभीर घटना है जो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ (मीडिया) और सरकारी संस्थानों की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़ी करती है।ताज़ा मामला हरदोई जिले के बेंदर ब्लॉक स्थित हाफिज खेड़ा प्राथमिक विद्यालय का है, जहाँ विकास के दावों की पोल खोलने पहुंची A2Z Voice (जन गण की आवाज़)की मुख्य रिपोर्टर ज़ैनब अक़िल खान के साथ न केवल अभद्रता की गई, बल्कि उन्हें जान से मारने और 'पत्रकारिता' देख लेने की धमकी तक दी गई।
क्या था पूरा मामला?
रिपोर्टर ज़ैनब अक़िल खान स्कूल में सिर्फ यह जानने पहुंची थीं कि पिछले 5 सालों में स्कूल के बुनियादी ढांचे और शिक्षा के स्तर में क्या सुधार हुए हैं। शुरुआत में एक महिला शिक्षक ने बीमारी और BLO ड्यूटी का बहाना बनाया, लेकिन जैसे ही कैमरा ऑन हुआ, शिक्षक का रवैया बदल गया। हैरतअंगेज मोड़ तब आया जब विद्यालय के प्रधानाध्यापक पंकज मौके पर पहुंचे। उन्होंने न केवल महिला पत्रकार के साथ धक्का-मुक्की की, बल्कि उनका कैमरा तोड़ने का प्रयास भी किया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, प्रधानाध्यापक ने महिला पत्रकार का हाथ पकड़कर उन्हें जबरन स्कूल परिसर से बाहर निकाला और गेट बंद करते हुए सरेआम धमकी दी— "तुम्हारी पत्रकारिता हम अकेले में निकालेंगे, देखते हैं तुम कितनी बड़ी पत्रकार हो।" साथ ही प्रिन्सिपल ने सरकारी कर्मचारी होने का रौब दिखाते हुए पत्रकार के साथ गाँव वालों को भी धक्का देते हुवा खदेड़ा |
सवाल ये है कि प्रिन्सिपल सहित शिक्षक को किस बात का भय सता दिया क्या बच्चों की शिक्षा का स्तर या कुछ और? स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह दबंगई नई नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार, संबंधित कर्मचारी सत्ता पक्ष और अपनी जातिगत रसूख का हवाला देकर अक्सर ऐसा ही करते हैं। लेकिन एक महिला पत्रकार ले साथ ये व्यापार बिल्कुल नजरअन्दाज करने के काबिल नहीं है..ग्रामीणों का आरोप है कि ये कर्मचारी खुद को कानून से ऊपर समझते हैं और इसी वजह से स्कूल की हालत दयनीय है।प्रिन्सिपल ने खुले आम गुंडागर्दी दिखाते हुए ना केवल पत्रकार के साथ धक्का-मुक्की की ब्लकि गाँव वालों को भी धक्का मारते हुए बाहर खदेड़ा
घटना के बाद जब पीड़ित महिला पत्रकार थाने पहुंचीं, तो वहां भी उन्हें 'पैरवी' का सामना करना पड़ा और बिना परमिशन अंदर जाने पर सवाल पूछा गया हालांकि, भारी जद्दोजहद के बाद पत्रकार ने अपनी लिखित शिकायत दर्ज कराई है।सवाल ये है कि जहां सरकार सरकारी स्कूल पर इतने पैसे खर्च कर रही है और हर तरफ़ माडल स्कूल बना रही है वहीं वहां के सरकारी कर्मचारी क्या खुद को कानून से उपर समझने लग गए हैं? सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी स्कूल किसी की निजी जागीर है?
क्या सरकारी पैसे से वेतन लेने वाले कर्मचारियों से सवाल पूछने के लिए 'दबंगों' से अनुमति लेनी होगी?सरकारी स्कूल एक सार्वजनिक संस्थान है, जहाँ जनता के टैक्स का पैसा लगता है। एक पत्रकार का काम जनहित में वहां की स्थिति दिखाना है। इसके लिए किसी "लिखित अनुमति" की अनिवार्य आवश्यकता नहीं होती, खासकर तब जब गेट खुला हो और बच्चे वहां मौजूद हों।माननीय उच्चतम न्यायालय ने कई बार कहा है कि मीडिया का काम सत्ता और प्रशासन की जवाबदेही तय करना है। रिपोर्टिंग करना कोई "अनाधिकार प्रवेश" नहीं है जब तक कि वहां कोई आपराधिक मंशा न हो।
इस पूरी घटा को लेकर जनता के प्रशासन से कई सवाल है..क्या उत्तर प्रदेश में एक महिला पत्रकार सुरक्षित नहीं है? ड्यूटी पर तैनात एक पुरुष सरकारी कर्मचारी को महिला पत्रकार का हाथ पकड़कर धक्का देने और धमकी देने का अधिकार किसने दिया? जिस गाँव का विद्यालय है क्या प्रिन्सिपल के सामने उसी गाँव के लोगों का कोई सम्मान नहीं है ? सरकार स्कूलों और शिक्षकों की सैलरी पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, फिर भी हाफिज खेड़ा जैसे स्कूल में छात्रों की संख्या 10-15 में क्यों सिमटी हुई है?क्या 'सत्ता पक्ष' का नाम लेकर सरकारी कर्मचारी अपनी कमियों को छिपाने और मीडिया की आवाज दबाने के लिए स्वतंत्र हैं?क्या हरदोई के जिलाधिकारी और बेसिक शिक्षा अधिकारी इस गंभीर घटना का संज्ञान लेंगे, या रसूखदार प्रधानाध्यापक के खिलाफ मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
थाने में शिकायत के वक्त इंस्पेक्टर द्वारा आरोपी की पैरवी करना क्या पुलिस की निष्पक्षता पर सवालिया निशान नहीं खड़ा करता? पत्रकार के साथ गाँव भी न्याय की मांग कर रहा है देखना यह है जहां सरकार ज़ीरो ट्रालेरेन्स की बात करती है वहां इस गंभीर मामले को कब संज्ञान में लेती है और हरदोई के जिलाधिकारी इस पर कब कारवाई करती है?




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