सरहद पर 'सफेद जहर' का कहर: खाकी की चुप्पी या मिलीभगत? रुपईडीहा बना नशे का नया 'हब'
आइडियल इंडिया न्यूज़
अनवार खां मोनू बहराइच
बहराइच। भारत-नेपाल सीमा पर स्थित रुपईडीहा अब केवल व्यापारिक केंद्र नहीं, बल्कि नशे के सौदागरों की सुरक्षित शरणस्थली बन चुका है। स्मैक और प्रतिबंधित दवाओं का नेटवर्क इतनी गहराई तक फैल चुका है कि यहाँ की आबोहवा में अब व्यापार नहीं, बल्कि 'मौत का सामान' तैर रहा है। हैरानी की बात यह है कि दर्जनों चेकपोस्ट और सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी के दावों के बीच, नशे की खेप सरहद के पार कैसे पहुँच रही है?
स्थानीय हलकों में चर्चा है कि रुपईडीहा थाने की 'मलाईदार' पोस्टिंग के पीछे यही अवैध कारोबार है। जब भी कोई बड़ा अधिकारी निरीक्षण के लिए निकलता है, तो संदिग्ध ठिकानों के शटर पहले ही गिर जाते हैं। यह महज इत्तेफाक है या पुलिस महकमे के भीतर बैठे 'विभीषणों' का सूचना तंत्र? गाहे-बगाहे होने वाली गिरफ्तारियां केवल कागजी खानापूर्ति और आंकड़ों का खेल बनकर रह गई हैं। 'बड़ी मछलियां' आज भी जाल से बाहर हैं, जबकि केवल मोहरों को जेल भेजकर वाहवाही लूटी जा रही है।
मेडिकल स्टोर या नशे के अड्डे:
कस्बे के गली-कूचों में खुले वैध-अवैध मेडिकल स्टोरों पर प्रतिबंधित कफ सिरप, नशे के इंजेक्शन और गोलियां टॉफी-बिस्कुट की तरह बिक रही हैं। सूत्र बताते हैं कि यहाँ स्मैक की खरीद-फरोख्त का एक संगठित सिंडिकेट काम कर रहा है। सीमा पार (नेपाल) जाते ही इन नशीले पदार्थों की कीमत दस गुना तक बढ़ जाती है। इसी चंद रुपयों के लालच में क्षेत्र का युवा वर्ग न केवल नशे का आदी हो रहा है, बल्कि करियर की उम्र में जेल की सलाखों के पीछे पहुँच रहा है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं:
एसएसबी और स्थानीय पुलिस की संयुक्त चौकसी के बावजूद स्मैक की खेप सीमा पार कैसे हो रही है? क्या उच्च अधिकारियों को उन 'चिह्नित' मेडिकल स्टोरों की जानकारी नहीं है, जो बिना प्रिस्क्रिप्शन के प्रतिबंधित दवाएं बेच रहे हैं?
क्या रुपईडीहा थाने की जवाबदेही तय करने के लिए किसी गुप्त विजिलेंस जांच की आवश्यकता नहीं है?
जनता की आवाज:
"जब रक्षक ही मौन साध ले, तो भक्षक बेखौफ होंगे ही। अगर समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो सरहद का यह इलाका अपराध की ऐसी गर्त में गिरेगा जहाँ से वापसी नामुमकिन होगी।"

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