ग्वालियर शहर की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने हेतु एक विशेष शैक्षणिक भ्रमण
आइडियल इंडिया न्यूज़
ब्यूरो डेस्क, ग्वालियर
भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान (आईआईटीटीएम) के तत्वावधान में 120 प्रतिभागियों के लिए ग्वालियर शहर की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने हेतु एक विशेष शैक्षणिक भ्रमण का आयोजन किया गया। इस अध्ययन भ्रमण का संचालन संस्थान के प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. चन्द्रशेखर बरुआ एवं श्री रामकृष्ण कोंगल्ला द्वारा किया गया। ब्रँड अंबेसेडर डॉक्टर कुमारी अर्चना मेडेवार ने बताया कि भ्रमण का उद्देश्य प्रतिभागियों को ग्वालियर के समृद्ध इतिहास, स्थापत्य कला, संगीत परंपरा एवं स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े महत्वपूर्ण स्थलों की जानकारी प्रदान करना था।
भ्रमण की शुरुआत महाराज बाड़ा (जयाजी चौक) को ग्वालियर शहर का हृदय माना जाता है, ठीक उसी प्रकार जैसे दिल्ली का कनॉट प्लेस, मुंबई का फ्लोरा फाउंटेन क्षेत्र या जयपुर का बड़ी चौपड़ अपने-अपने शहरों के प्रमुख व्यावसायिक और सामाजिक केंद्र हैं। सिंधिया शासनकाल में विकसित महाराज बाड़ा न केवल व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र रहा, बल्कि यह राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजनों का भी प्रमुख स्थल रहा है। इसके चारों ओर स्थित ऐतिहासिक इमारतें, बाजार और स्मारक ग्वालियर के विकास एवं विरासत की कहानी बताते हैं। आज भी यह क्षेत्र स्थानीय नागरिकों, पर्यटकों और व्यापारियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थानों में से एक है तथा ग्वालियर की पहचान का प्रतीक माना जाता है।
इसके बाद प्रतिभागियों ने छत्री बाजार स्थित सिंधिया राजवंश की छतरियों का अवलोकन किया। ये भव्य स्मारक सिंधिया शासकों की स्मृति में निर्मित किए गए हैं और अपनी उत्कृष्ट स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध हैं। अगला पड़ाव टकसाल रहा, जो ऐतिहासिक काल में मुद्रा निर्माण और प्रशासनिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। यहां प्रतिभागियों को ग्वालियर राज्य की आर्थिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था के बारे में जानकारी दी गई।
इसके पश्चात सभी प्रतिभागी सरोद घर (Sarod Ghar) ग्वालियर का एक अद्वितीय संगीत संग्रहालय है, जो भारतीय शास्त्रीय संगीत की विरासत को संरक्षित और प्रचारित करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है। यह संग्रहालय विश्वविख्यात सरोद वादक Amjad Ali Khan के पैतृक निवास में स्थित है, जिसे उन्होंने संगीत संरक्षण के लिए समर्पित किया था। इसका संचालन हाफिज अली खान मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। सरोद घर की स्थापना भारतीय शास्त्रीय संगीत, संगीतज्ञों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से की गई। यह देश के उन विरले संग्रहालयों में से एक है जो पूर्णतः संगीत विरासत को समर्पित हैं। संग्रहालय का उद्देश्य ग्वालियर की समृद्ध संगीत परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाना तथा गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को संरक्षित करना है। ग्वालियर को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की प्रमुख जन्मस्थली माना जाता है। यह नगर ग्वालियर घराने के लिए विश्व प्रसिद्ध है तथा महान संगीत सम्राट Tansen की कर्मभूमि रहा है। सरोद घर इस गौरवशाली संगीत परंपरा का जीवंत प्रतीक है।
दुर्लभ वाद्य यंत्रों का संग्रह
सरोद घर में भारत के महान संगीतज्ञों द्वारा उपयोग किए गए अनेक ऐतिहासिक वाद्य यंत्र संरक्षित हैं, जिनमें शामिल हैं—
• गुलाम बंदगी खान बंगश का रबाब
• नन्ने खाँ का सरोद
• उस्ताद हाफिज अली खाँ का सरोद
• असगर अली खाँ का सरोद
• पं. कृष्णराव शंकर पंडित का तानपुरा
• उस्ताद अलाउद्दीन खाँ का वायलिन
• अहमद जान थिरकवा एवं कांथे महाराज के तबले
ये वाद्य यंत्र भारतीय संगीत इतिहास की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं।
भ्रमण के दौरान प्रतिभागियों ने रानी लक्ष्मीबाई समाधि स्थल का भी दर्शन किया। यह वही स्थान है जहां 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए वीरगति प्राप्त की थी। यह स्मारक आज भी देशभक्ति और साहस का प्रेरणास्रोत है।
भ्रमण का अंतिम एवं अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव गुजरी महल राज्य पुरातत्व संग्रहालय रहा। यह संग्रहालय ग्वालियर दुर्ग की तलहटी में स्थित है और मध्य भारत की समृद्ध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा पुरातात्विक धरोहर का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। इसका निर्माण 15वीं शताब्दी में तोमर वंश के राजा मानसिंह तोमर ने अपनी प्रिय रानी मृगनयनी (गुर्जर रानी) के लिए कराया था। बाद में इस महल को पुरातत्व संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया। संग्रहालय में पहली-दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर मध्यकाल तक की दुर्लभ मूर्तियां, शिलालेख, सिक्के, टेराकोटा कलाकृतियां, शस्त्र तथा विभिन्न राजवंशों से संबंधित पुरावशेष सुरक्षित हैं। यहां प्रदर्शित कलाकृतियां गुप्त, प्रतिहार, परमार और अन्य ऐतिहासिक कालखंडों की कला एवं संस्कृति का परिचय कराती हैं। संग्रहालय की विभिन्न दीर्घाएं भारतीय मूर्तिकला, स्थापत्य कला और प्राचीन जीवन शैली के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
भ्रमण के दौरान प्रतिभागियों ने संग्रहालय में संरक्षित दुर्लभ पुरावशेषों का अवलोकन किया तथा ग्वालियर क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, कला परंपरा और ऐतिहासिक विकास के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की। यह स्थल इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए एक जीवंत अध्ययन केंद्र के रूप में विशेष महत्व रखता है|
आईआईटीटीएम की निदेशक डॉ. मोनिका प्रकाश ने कहा कि, "ऐसे शैक्षणिक एवं विरासत भ्रमण विद्यार्थियों और प्रतिभागियों को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम हैं। ग्वालियर जैसे ऐतिहासिक नगर का प्रत्यक्ष अध्ययन पर्यटन शिक्षा को व्यावहारिक आयाम प्रदान करता है तथा विरासत संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाता है।"
संस्थान के नोडल अधिकारी डॉ. सौरभ दीक्षित ने कहा कि, "पर्यटन क्षेत्र से जुड़े प्रतिभागियों के लिए स्थानीय इतिहास, संस्कृति और विरासत स्थलों का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। इस प्रकार के अध्ययन भ्रमण उनके ज्ञान, कौशल और व्यावसायिक दृष्टिकोण को समृद्ध करते हैं।"
इस अवसर पर डॉ. चन्द्रशेखर बरुआ ने कहा कि ग्वालियर केवल एक ऐतिहासिक नगर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, संगीत, वीरता और स्थापत्य कला का जीवंत केंद्र है।
महाराष्ट्र पर्यटन संचालनालय, मुंबई के उपनिदेशक श्री विजय जाधव ने कहा कि, "भारत की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरें पर्यटन विकास की आधारशिला हैं। ग्वालियर जैसे विरासत संपन्न शहरों का अध्ययन पर्यटन पेशेवरों और गाइडों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस प्रकार के शैक्षणिक भ्रमण विभिन्न राज्यों के पर्यटन कर्मियों को एक-दूसरे की सांस्कृतिक विरासत, संरक्षण प्रयासों और पर्यटन प्रबंधन की श्रेष्ठ कार्यप्रणालियों को समझने का अवसर प्रदान करते हैं।
महाराष्ट्र पर्यटन विभाग से आए श्री अजीमुद्दीन शेख ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि, "ग्वालियर की ऐतिहासिक धरोहरें, संगीत परंपरा और सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध हैं। इस भ्रमण के माध्यम से प्रतिभागियों को भारत की विविध विरासत को निकट से समझने का अवसर मिला, जो पर्यटन क्षेत्र में कार्यरत लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है।"
वहीं श्री रामकृष्ण कोंगल्ला ने प्रतिभागियों को विरासत संरक्षण के महत्व से अवगत कराते हुए कहा कि ऐसे शैक्षणिक भ्रमण युवाओं को अपने इतिहास और सांस्कृतिक धरोहरों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम हैं।
भ्रमण के अंत में प्रतिभागियों ने ग्वालियर की ऐतिहासिक विरासत, संगीत परंपरा और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े स्थलों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की तथा इस अनुभव को अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक बताया।










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