''मुस्लिम खान बाबा' की मौत के बाद जिस तरह एक हिंदू परिवार ने पहल की, वह सांप्रदायिक सद्भाव का एक बड़ा उदाहरण है।
आइडियल इंडिया न्यूज़
देवीदास महाजन, भाडगांव जलगांव महाराष्ट्र
यावल शहर (जलगांव ज़िला) से सामने आई यह घटना *सच में भारतीय संस्कृति और इंसानियत की झलक है। 'मुस्लिम खान बाबा' की मौत के बाद जिस तरह एक हिंदू परिवार ने पहल की, वह सांप्रदायिक सद्भाव का एक बड़ा उदाहरण है।*
इस घटना की ज़रूरी बातें इस तरह हैं:
1. धर्म से परे इंसानियत
खान बाबा कई सालों से यावल शहर में रह रहे थे। भले ही उनका किसी से खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन शहर के एक हिंदू परिवार ने उन्हें अपना सदस्य माना। उनकी मौत के बाद इस परिवार ने न सिर्फ़ दुख जताया, बल्कि उनके अंतिम संस्कार की सारी ज़िम्मेदारी भी उठाई।
2. एक हिंदू परिवार के घर पर अंतिम संस्कार की तैयारी
समाज में हम अक्सर दीवारें देखते हैं, लेकिन इस घटना में खान बाबा के शव को हिंदू परिवार के घर से इज्ज़त के साथ निकाला गया। परिवार ने इस्लामी रीति-रिवाजों के हिसाब से उनके अंतिम संस्कार (जनाजा) का सारा इंतज़ाम किया और मुस्लिम भाइयों को बुलाकर इज्ज़त के साथ अलविदा कहा।
3. समाज के लिए एक अच्छा मैसेज
आज के समय में, जहाँ धर्म के नाम पर दीवारें खड़ी की जाती हैं, यावल की इस घटना ने कुछ ज़रूरी सबक सिखाए हैं:
*इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है: मुश्किल समय में या मौत के बाद बिना जाति देखे मदद करना ही सच्ची भक्ति है।*
सांस्कृतिक एकता: खान बाबा की अंतिम यात्रा में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए।
*इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि "इंसान, इंसान के साथ इंसान जैसा व्यवहार करे" ही सच्ची इंसानियत है। यावल शहर के इस काम की हर तरफ तारीफ हो रही है।*


0 टिप्पणियाँ