स्कूली विद्यार्थियों ने किया समाजसेवी बनकर जगह-जगह कंबल एवं श्रीफल का वितरण, - Ideal India News

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स्कूली विद्यार्थियों ने किया समाजसेवी बनकर जगह-जगह कंबल एवं श्रीफल का वितरण,

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स्कूली विद्यार्थियों ने किया समाजसेवी बनकर जगह-जगह कंबल एवं श्रीफल का वितरण,

आदर्श पांडेय,



पन्ना;- पंडित श्री शिव गोविंद गर्ग उच्चतर माध्यमिक सलेहा के विद्यार्थियों द्वारा इस ठंड में पुलिस स्टाफ, व्यापारी, शिक्षक एवं आम नागरिकों के सहयोग से जगह-जगह जाकर करीबन ₹5000 के कंबल चादर एवं श्रीफल वितरण किया है, जिससे उनकी इस कार्य की चारों तरफ प्रशंसा हो रही है और लोगों से आगे आने के लिए अपील भी की है कार्यक्रम में मुख्य रूप से उपस्थित हुए आदर्श पांडेय, हर्ष पांडेय, आकाश पांडेय, शुभम मिश्रा, मोहित नामदेव, आदित्य मिश्रा, श्रेयांश जैन आदि की उपस्थिति के साथ समाजसेवियों ने सराहनीय कार्य किया साथ ही बच्चों का कहना है कि “गरीबी उन वस्तुओं की पर्याप्त आपूर्ति का अभाव है जो व्यक्ति तथा उसके परिवार के स्वास्थ्य और कुशलता को बनाये रखने में आवश्यक है।” इस प्रकार केवल भोजन, वस्त्र और आवास के प्रबन्ध से ही निर्धनता की समस्या समाप्त नहीं हो जाती. बल्कि व्यक्तियों के लिए ऐसी वस्तुएँ भी प्राप्त होना आवश्यक है जिससे स्वास्थ्य और कुशलता का एक सामान्य स्तर बनाये रखा जा सके। आम तौर पर सरकारी सत्ता और संसाधनों के निजी फ़ायदे के लिए किये जाने वाले बेजा इस्तेमाल को भ्रष्टाचार की संज्ञा दी जाती है। एक दूसरी और अधिक व्यापक परिभाषा यह है कि निजी या सार्वजनिक जीवन के किसी भी स्थापित और स्वीकार्य मानक का चोरी-छिपे उल्लंघन भ्रष्टाचार है। विभिन्न मानकों और देशकाल के हिसाब से भी इसमें तब्दीलियाँ होती रहती हैं। मसलन, भारत में रक्षा सौदों में कमीशन ख़ाना अवैध है इसलिए इसे भ्रष्टाचार और राष्ट्र- विरोधी कृत्य मान कर घोटाले की संज्ञा दी जाती है। लेकिन दुनिया के कई विकसित देशों में यह एक जायज़ व्यापारिक कार्रवाई है। संस्कृतियों के बीच अंतर ने भी भ्रष्टाचार के प्रश्न को पेचीदा बनाया है। उन्नीसवीं सदी के दौरान भारत पर औपनिवेशिक शासन थोपने वाले अंग्रेज़ अपनी विक्टोरियाई नैतिकता के आईने में भारतीय यौन-व्यवहार को दुराचरण के रूप में देखते थे। जबकि बीसवीं सदी के उत्तरार्ध का भारत किसी भी यूरोपवासी की निगाह में यौनिक-शुद्धतावाद का शिकार माना जा सकता है।

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