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मैं वहीं धारावाहिक पूरानी। पापुलर थी मेरी कहानी।

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मैं वहीं धारावाहिक पूरानी।
पापुलर थी मेरी कहानी।

हमने जीए थे कई चरित्र।
सुलझे अनसुलझे विचित्र।
कुछ थे सकारात्मक।
कुछ थे नकारात्मक।
कुछ थे संदेशात्मक।
कुछ थे भावात्मक।
सब के सब संदेहास्पद।
हास्यप्रद, विवादास्पद।
जीवन का था ताना-बाना।
था बिल्कुल जाना-पहचाना।
दर्शकों को बनाती दीवानी।
जटिल थी पारिवारिक कहानी।

मैं वहीं धारावाहिक पूरानी।
पापुलर थी मेरी कहानी।

सही दिशा बढ़ चली कहानी।
टी आर पी भी चढ़ी मस्तानी।
प्रोड्यूसर था बड़ा व्यापारी।
डायरेक्टर की थी मंशा न्यारी। 
लेखक से कहता प्रोड्यूसर।
जोड़ते जाओ नये कैरेक्टर।
चाचा-चाची, दादा-दादी।
ताऊ ताई, भईया और भाभी।
मामा-मामी, नाना-नानी।
मौसा मौसी, बहन सयानी।
सास-ससुर, देवर देवरानी।
नन्द ननदोई, जेठ जेठानी।

मैं वहीं धारावाहिक पूरानी।
पापुलर थी मेरी कहानी।

कब तक खींची जाती डोर।
लेखक बन गया कहानी चोर।
कभी दाएं से कभी बाएं से।
जोड़े कहानी चाहें जहां से।
जोड़ता गया लेखक बेचारा।
लिखता गया मिला न चारा।
माथे ऊपर से बह गया पानी।
बेपटरी सी हो गई कहानी।
जब टी आर पी लगा घटने।
विज्ञापन भी लगे हटने।
होने लगी चैनल को हानि।
तैय हो गई मेरी रवानी।

मैं वहीं धारावाहिक पूरानी।
पापुलर थी मेरी कहानी।

आलोक विश्व मित्र
जलालीपट्टी वाराणसी उत्तरप्रदेश


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