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यहां माताएं नहीं कुंवारी कन्याएं करती है जीवित्पुत्रिका व्रत

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कमल कुमार कश्यप
 रांची झारखंड बिहार

यहां माताएं नहीं कुंवारी कन्याएं करती है जीवित्पुत्रिका व्रत

 आदि काल से चली आ रही है परंपरा वर व घर पाने के लिये करती है जीवित्पुत्रिका का उपवास 


 झारखंड का एक प्रमुख त्योहार है इसे आदिवासी और गैर आदिवासी निष्ठा और विश्वास के साथ मनाते हैं| मान्यता है कि जीवित्पुत्रिका व्रत मां संतान की लंबी आयु के लिए रखती है| जिन महिलाओं के बच्चे नहीं हैं, उन्हें जिउतिया व्रत करने का अधिकार नहीं है| पर खूंटी जिले के कटरा प्रखंड के पश्चिमी भाग के कई गांव में कुंवारी कन्याएं जिउतिया करती हैं| सुनने में भले अटपटा लगे लेकिन पहाड़ टोली, बमरजा, डूमरगढ़ी, कईसारा, खटंगा, कंडर, अकेला, कुरकुरी, याबुरी, रोमा, सहित कई गांव में कुंवारी लड़कियां वर और घर पाने के लिए जितिया का उपवास रखते हैं| करा प्रखंड के पहाड़ टोली गांव के पांडे पहन बताते हैं कि कुवारी लड़कियों की जितिया पूजा करने की परंपरा उनके गांव में सदियों से चली आ रही है| पूर्वजों के काल से चली आ रही इस परंपरा को वह भी बखूबी निभाते आ रही हैं| इस अनोखी परंपरा से शुरू होने के पीछे क्या कारण रहे होंगे इसकी जानकारी उन्हें नहीं है| उन्होंने बताया कि जितिया पूजा के दिन तीन कुंवारे लड़के जंगल में कर्म डाली गांव के अखाड़ा तक लाते हैं| यहां गांव के पानी से स्थापित करते हैं| इसके 1 सप्ताह पूर्व तीन कुंवारी लड़कियां नदी से महीन बालू लेकर आती हैं| इस  महीन बालू के साथ सात प्रकार के अनाज का बीज मिलाती हैं |इस बांस की बनी तीन अलग-अलग डाल में रखा जाता है| इसे घर के एक स्थान पर रखा जाता है| इसे जितिया का जावा कहा जाता है| 1 सप्ताह के दौरान उसमें पौधे तैयार हो जाते हैं, जिसका जावा अधिक होता है, उसे उतना ही अच्छा माना जाता है |पहन बताते हैं कि उनके पूर्वजों की परंपरा के तहत जितिया पूजा के दौरान कर्म अखाड़ा में पूजा अर्चना के बाद लाल रंग के मुर्गे की बलि दी जाती है| बलि दिए जाने वाले मुर्गे की चावल के साथ पकाया जाता है| इसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जाता है |इस प्रकार की इस प्रसाद को महिलाएं नहीं ग्रहण करती हैं| इसे पहन के परिवार के पुरुष ही ग्रहण करते हैं जितिया पूजा में जावा का काफी महत्व है| पहाड़ टोली और आस-पास के गांव में कुंवारी लड़कियों ने जावा उठाया है घर में जवा स्थापित कर रोज पूजा अर्चना की जा रही है| यहां की यही परंपरा है, जो सुनने में तो  अटपटा है लेकिन सत्य है |

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