जहां कल तक उसका अपना आशियाना था। एक लघु कथा ,आलोक विश्वमित्र की कलम से✍ - Ideal India News

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जहां कल तक उसका अपना आशियाना था। एक लघु कथा ,आलोक विश्वमित्र की कलम से✍

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जहां कल तक उसका अपना आशियाना था। 
 एक लघु कथा ,आलोक विश्वमित्र की कलम से✍
Jay Chand
जलालीपट्टी वाराणसी



रामदीन हाथों में लड्डू लिये बेबस सा एक वृक्ष के नीचे खड़ा था। उसके दोनों आंखों से आसूं बह रहे थे। उसकी बेबस आंखे उस जगह को निहार रही थी। जहां कल तक उसका अपना आशियाना था। 
सड़क किनारे पॉश इलाके के सम्मुख बने कई झोपड़ियों से बनी हुई छोटी सी बस्ती। शहर के बीचोबीच बसी यह बस्ती किसी के भी आंखों में खटक सकती है। परन्तु बस्ती वासियों के लिए यह स्थान स्वर्ग से कम नहीं था।
अभी दो दिन पहले की ही बात थी। बस्ती के सभी बच्चे एक साथ मिलकर स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहे थे। रामदीन का लड़का दीनू, अपने साथियों के संग राष्ट्रगान की तैयारी कर रहा था। सारे बच्चों ने मिलकर स्वतंत्रता दिवस की अच्छी खासी तैयारी कर रहे थे। बस्ती के बड़े बुजुर्ग और महिला भी कम उत्साहित न थी।
अचानक चार-पांच की संख्या में नीली बत्ती लगी कारें अंधेरे का सीना चीरते हुए वस्ती के सामने आ रुकीं। हूटर की आवाज हृदय में कम्पन उत्पन्न कर रही थी। बस्ती वालों को कल सुबह तक जगह ख़ाली करने का आदेश देकर अंधेरे में विलुप्त हो गई।
अगली सुबह बस्ती वासी निकल पड़े थे। अपने सामानों के साथ नई जगह की तलाश में। करते भी क्या यह तो उनकी नियति थी। देखते ही देखते बस्ती मैदान में तब्दील हो चुकी थी। तैयार चल रही थी जश्न-ए-आजादी की। दुल्हन की तरह सजी हुई थी पॉश कॉलोनी। आज आजादी की पूर्वसंध्या, पर कालोनी को मिल चुकी थी आजादी। आजादी उस गरीबो की बस्ती से जो उन अमीरों को खटती थी।
रात भर रामदीन जागता रहा। सोता भी कैसे? उसे स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हुई थी। उसे तो स्वतंत्र कर दिया गया था। वह एक टक देखता रहा खुलें आसमान में। उसके कानों में एक धुन सी बज रही थी। हिंद देश के निवासी सभी जन हम एक हैं.........
सुबह उस जगह रामदीन को पहुंचने में देर हो गई। कल तक जहां उसकी झोपड़ी थी वहां ध्वज लहरा रहा था। लोग काफी उत्साहित थे। लोगों में लड्डू बंट रहे थे।
रामदीन हाथों में लड्डू लिये बेबस सा एक वृक्ष के नीचे खड़ा था। उसकी दोनों आंखों से आसूं बह रहे थे। उसकी गीली नम आंखे उस जगह को निहार रही थी, जहां कल तक उसका आशियाना था।
अचानक उसके कानों में गीत सुनाई दी। यह उसके बेटे की आवाज थी। मंच पर खड़ा उसका बेटा बड़े गर्व से गा रहा था ------ 
हम पंछी उन्मुक्त गगन के,
नील गगन को उड़ जाएंगे,
आज यहां हैं, कल कहीं,
घोंसला नया बनाएंगे।।
हम स्वतंत्र हैं,
हम आजाद हैं।

आलोक विश्वमित्र
जलालीपट्टी, वाराणसी, उत्तरप्रदेश २२११०८

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