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देश प्रेम के रंगों में रंगी राची मे अब्दुल सत्तार चौधरी की रसधार

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कमल कुमार कश्यप
 रांची झारखंड बिहार

झंडा दिवस पर विशेष

 देश प्रेम के रंगों में रंगी राची मे अब्दुल सत्तार चौधरी की रसधार



शहर के हृदय स्थल कहे जाने वाले अपर बाजार में जामा मस्जिद के नीचे एक छोटी सी दुकान  छोटे से लेकर बड़े आकार के राष्ट्रीय झंडों से पटी रहती है| राष्ट्रीय त्योहारों पर तो इनकी रौनक देखते बनती है| यह ऐसी दुकान कहीं जा सकती है, जहां देश प्रेम बिकता है| देश के प्रति प्रेम व श्रद्धा की मिसाल बन चुके राजधानी के अब्दुल सत्तार चौधरी पिछले 45 वर्षों से यह तिरंगा झंडा तैयार करने का काम कर रहे हैं| करीब 75 साल के हो चुके सतार का परिवार भी इसी काम में जुड़ चुका है| सभी धर्म के लोग यहां तिरंगा खरीदने पहुचते है |अब्दुल भाई तिरंगे के तीन रंग केसरिया सफेद और हरे रंग के कपड़ों को सील कर झंडे का रूप देते हैं| परिवार के सदस्य भी झंडे की सिलाई व उसे अंतिम रूप देने में जुटे रहते हैं| अब्दुल सत्तार चौधरी की बढ़ती उम्र कभी काम में रुकावट नहीं बनी, बल्कि परिवार का हर सदस्य इसी पैसे से जुड़ता चला गया |अब्दुल सत्तार को मिलाकर परिवार में कुल 10 सदस्य हैं कोरोना महामारी के बीच भी अब्दुल चाचा ने हिम्मत नहीं हारी| और पिछले वर्ष भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर पूरे जोश के साथ झंडा बनाया|
 अपर बाजार में जामा मस्जिद के नीचे एक छोटी सी दुकान में अब्दुल चाचा ने करीब 45 साल पहले एक सिलाई मशीन में से तिरंगा झंडा सिलने का काम शुरू किया था, वे कहते हैं, नहीं सोचा था कि यह झंडा बनाने का काम जिंदगी  से इस कदर जुड़ जाएगा कि उम्र भर यही करना पड़ेगा| आमतौर पर 60 वर्ष में लोग सेवानिवृत्त हो जाते हैं, लेकिन इस काम के प्रति लगन और प्रेम ने अब्दुला चाचा की सक्रियता कम नहीं होने दी| अब्दुल चाचा बताते हैं कि इस काम में जो सम्मान  मिलता है उसी की कमाई खाते हैं| इस काम को पूरे परिवार ने अपनाया और आगे बढ़ाने में जुटा है|
 जानकार बताते हैं कि नाम के साथ चौधरी शब्द जोड़ना भी दिलचस्प कहानी है| अब्दुल सत्तार के नाम में चौधरी जुड़ने के पीछे भी एक कहानी है बताया जाता है, कि अब्दुल करीब 14 वर्षों तक इदरीसीया पंचायत के अध्यक्ष के रूप में रहे| जहां उन्होंने जरूरतमंदों की सेवा की और जिन्हें भी जरूरत पड़ी मदद की| ईद रिसिया पंचायत का इतने दिनों तक अध्यक्ष बने रहने के बाद उनके नाम के साथ चौधरी शब्द जुड़ गया जिसे आज भी लोग चौधरी चाचा ही कह करके बुलाते हैं|
 चौधरी अब्दुल चाचा बताते हैं कि, राष्ट्रीय ध्वज बनाने का जुनून और इस ध्वज से ही शहीदों को सम्मान देने का गौरव हासिल करना आसान नहीं होता| अब्दुल सत्तार चौधरी बताते हैं कि जब देश का कोई लाल शहीद होता है और उसके लिए आर्मी की ओर से ध्वस्त तैयार करने को कहा जाता है| किसी शहीद के लिए तिरंगा तैयार  करने में रूह कांप जाती है| सोचने लग जाते हैं कि आखिर हमारे जवान शहीद क्यों होते हैं, हमेशा यही दुआ मांगते हैं कि कोई लाल शहीद ना हो और देश का तिरंगा हमेशा ऊंचा रहे| शहीद सैनिक के सम्मान के लिए पांच बाई 6 .5 फीट का तिरंगा तैयार करना होता है|
 वही परिवार के 10 सदस्य छोटे से लेकर बड़े आकार के झंडे तैयार करते हैं| इन झंडों को जरूरत के हिसाब से सरकारी कार्यालय तक पहुंचाया जाता है| और उनके बेटे उमर खान बताते हैं कि झंडे के सबसे अधिक डिमांड गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर आती है |छोटे झंडे अधिक बिके जबकि बड़े आकार के मांग सीमित होती है| इन दो विशेष अवसरों के अलावा संस्थानों व सरकारी कार्यालयों से झंडे की मांग कभी-कभी की जाती है|बडा झंडा परिवार होने के कारण आर्थिक कठिनाइयां हैं, इसलिए बीच के कुछ माह में रेडीमेड कपड़े तैयार कर परिवार का सदस्य बेचते हैं| दोनों दिवस की तैयारी कम से कम 3 माह पहले शुरू कर दी जाती है|

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