अफगानिस्तान में अमेरिका हारा, अब क्या सीरिया जैसे बनेंगे हालात, - Ideal India News

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अफगानिस्तान में अमेरिका हारा, अब क्या सीरिया जैसे बनेंगे हालात,

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अफगानिस्तान में अमेरिका हारा, अब क्या सीरिया जैसे बनेंगे हालात,


Adarsh pandey


-》》 भारतीय सुरक्षा के जानकारों और विदेश नीति के विशेषज्ञों ने अपने देश से भी अफगानिस्तान के मामले में संवेदनशीलता बरतने, सैन्यबल की तैनाती आदि से परहेज करने की सलाह दी है।


सेना तैनाती पर सोचना भी गुनाह
विदेश मामलों के जानकार प्रो. एसडी मुनि कहते हैं कि वहां सैन्य या सुरक्षा बल तैनाती जैसे कदम पर सोचना भी गुनाह है। हालत यह है कि अफगानिस्तान में अमेरिका और भारत द्वारा प्रशिक्षित 20 हजार के करीब अफगान सुरक्षा बलों ने ताजकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और आसपास के देशों की सीमाओं में शरण ले ली है। यह स्थिति तालिबान के भय के कारण बन रही है। दूसरी तरह तालिबान लगातार अफगानिस्तान में लगातार एक नए शहर पर कब्जा करने का अभियान जारी रखे है।


सावधानी से कदम बढ़ाने की जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का उद्देश्य वहां लोगों को शिक्षित करना, सैनिकों को प्रशिक्षित करना, ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने में मदद देना, बांध का निर्माण तथा संसाधनों का विकास तक सीमित था। लेकिन इसके बावजूद सावधानी से कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। फिलवक्त स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत ने दूतावास में लोगों की संख्या बहुत सीमित कर दी है। वाणिज्यिक दूतावास की भी स्थिति इसी तरह की है। तमाम देशों ने अपने वाणिज्यिक दूतावासों को बंद करने का निर्णय ले लिया है।

90 के दशक में था नादर्न अलायंस

सूत्र का कहना है कि नब्बे के दशक में अफगानिस्तान में नादर्न अलायंस होता था। इसके सैन्य कमांडर अहमद शाह मसूद थे। तब बुरहानुद्दीन रब्बानी जैसी शख्सियत भी थी। बताते हैं अहमद शाह मसूद की हत्या के बाद नादर्न अलायंस धीरे-धीरे बिखर गया है। अब उनके बेटे अहमद मसूद की न तो वह ताकत है और न ही लोगों के बीच अहमद शाह मसूद जैसा रुतबा। अभी स्थानीय सैन्य कमांडरों के पास अपना संगठन तो है, लेकिन न तो उनके पास पर्याप्त संसाधन हैं और न हथियार।
तुर्कमेनिस्तान तो राकेट लांचर, लड़ाकू विमान तैनात करने की योजना बना रहा है। रूस ने टैंकों और सैन्य दस्तों को भेजने का मन बनाया है। चीन, पाकिस्तान और तालिबानी नेताओं से संपर्क के सहारे अपना हित साधने में जुटा है। इस पूरे प्रयास में चीन, रूस, ईरान क्षेत्र में किसी तीसरी शक्ति के दखल को रोकने और सामूहिक प्रयास से समस्या के समाधान का रास्ता ढूंढने में लगे हैं।



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