नवोदित कवि "शितान्शु " की रचना "संयुक्त परिवार" - Ideal India News

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नवोदित कवि "शितान्शु " की रचना "संयुक्त परिवार"

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ऐ छोटे ज़रा रूक तू इस दरमियाँ।
कहीं सब छूट न जाये रूठकर।
तू रुकने की जिद तो कर ।
आशियाँ खुद ब खुद तैयार हो जायेगा ।
इस कश्मकश में न रह।
कि लोग तुझे ढूढेंगे।
है समय कहाँ किसको ।
कि सब बिन तेरे भी रह लेंगे।


जो रहने लगे सब अकेले।
तो क्या हो जायेगा।
आने वाली पीढ़ी में ।
सब सभ्यता तितर बितर हो जायेगा।

रह लिया साथ तो ।
क्या अकेले रह पाएगा।
दूर होकर दिमाग तो नहीं।
पर दिल तेरा पछतायेगा।

परिवार में साथ रहा तो क्या सीखा।
दूर जाकर क्या बिसरे।
जिस्म तो रहता है।
पर जीते हैं आधे अधूरे ।

नहीं चाहिए परिवार एकल
जो मन को कर दे बेकल
मुझे तो चाहे परिवार ऐसा 
जिसमें मुखिया हो बाबा जैसा
गलती होने पर पिता डाट लगाये
वहीं चाचा गोद में लेकर प्यार जताये
जब फिसलन हो मन में
तब ताया ताई चाचा चाची सिमटायें अपने अंक में
क्या हुआ जो बहकूँ मैं हजार
परिवार संभाले हर एक बार
तो क्यों मैं तरसूं
तो क्यों मैं न हरसूं
संकटो पर करे मेरे वार
पाया जो मैं संयुक्त परिवार 
रचना-
 शितान्शु शेखर दुबे 
BA 1st year
गाँव भिसकुरी मिर्जापुर

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