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आस्था का केंद्र है निजाम शाह बर्री मियां की दरगाह

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डा शराफत अली मंसूरी शाहजहांपुर
आस्था का केंद्र है निजाम शाह बर्री मियां की दरगाह
जलालाबाद।



 कस्बे के मोहल्ला यूसुफ जई में स्थित निजाम शाह बर्री मियां की दरगाह मुस्लिमों समेत विभिन्न धर्मों से जुड़े लोगों के बीच आस्था का केंद्र रही है। इन दिनों दरगाह पर 27 फरबरी(शनिवार) से शुरू हो रहे तीन दिवसीय उर्स की जोर शोर से चल रही तैयारियों के बीच अकीदतमंदों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाएगा,
बताते हैं कि निजाम शाह बर्री मियां ‘रहमत तुल्ला अलैह’ अरब के बर्री प्रांत के रहने वाले थे और 1034 हिजरी में वह अपने पीर भाई लतीफ शाह बर्री के साथ सूफी मत का प्रचार करने के उद्देश्य से भारत आए थे। देश के विभिन्न जगहों पर घूमने के बाद निजाम शाह यहीं रम गए, जबकि लतीफ शाह ने अपना कार्य क्षेत्र रावलपिंडी जो अब पाकिस्तान में है उसे बनाया। इन धर्मगुरुओं ने हमेशा ही लोगों को नेक राह पर चलने की प्रेरणा दी।
दरगाह की यह है खास बात
कई विशेषताओं वाली दरगाह की एक खास बात यह है कि यहां नियुक्त होने वाले सज्जादानशीन का परिवार और समाज से संपर्क पूरी तरह कट जाता है। इस गद्दी पर बैठने के बाद दोबारा दरगाह की चहारदीवारी से बाहर निकलने की इजाजत नहीं होती। यहां तक कि मरने के बाद उसे दरगाह परिसर में ही दफना दिया जाता है। यहां मौजूद कई कब्र इसकी गवाह है।
अकीदतमंदों के आने का सिलसिला शुरू
हो जाया करता था लेनिन ईस बार  होने वाले उर्स को लेकर यहां अकीदतमंदों का आना शुरू नहीं  हो पाएगा क्योंकि इस बार अपने अपने घरों में ही रहकर उर्स मनाया। उर्स कमेटी के इस्लाम खां वारसी के अनुसार 1मार्च की शाम को कुल शरीफ होगा। उसके बाद जलालाबाद की अन्य दरगाह पर भी इसी तरह उर्स संपन्न और समापन होगा l
इस मौके पर मौलाना इकलाख नन्हे खान लियाक़त खान मेडिकल छात्र शराफत अली मंसूरी आदि लोग मौजूद रहे l

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