*महापर्व होली का धार्मिक एवं वैज्ञानिक वर्णन* - Ideal India News

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*महापर्व होली का धार्मिक एवं वैज्ञानिक वर्णन*

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 होली संपूर्ण भारत नेपाल मॉरीशस सहित कुछ अन्य देशों में मनाया जाने वाला एक महान पर्व है इसे होरी होली का मदनोत्सव धूलंडी काम उत्सव तथा होला मोहल्ला और अन्न या वसंतोत्सव भी कहा जाता है ऐसा माना जाता है की होली के 8 दिन पहले होलाष्टक लग जाता है और सभी धार्मिक और मांगलिक शुभ कार्य होली खेलने तक बंद हो जाते हैं। 

क्या सचमुच प्राचीन काल में होली खेली जाती थी ----

अगर गहराई से अध्ययन किया जाए तो वेद पुराण उपनिषद महाभारत और रामायण ग्रंथ तक कहीं भी होली पर्व का वर्णन नहीं मिलता है इसके बाद जातक और नारद संहिता तथा भविष्य पुराण में मदनोत्सव अथवा अन्य उत्सव के रूप में होली का वर्णन आता है लेकिन वहां भी रंग खेलने की कहीं चर्चा या परंपरा नहीं है इस समय बसंत उत्सव लग जाता था फसलें पक जाती थी लोग अपने घर के कार्यों में और फसल की कटाई और मड़ाई में व्यस्त रहते थे। 

शीतल मंद सुगंधधित मलय पवन के झोंके और चारों ओर फलों फूलों पत्तियों से लदी हुई वृक्ष लताओं की शोभा आम के बौर की  अमराई की गंधअद्वितीय होती थी और खेत और फसलों में घनघोर परिश्रम करने वाले लोग इन 8 दिनों में आमोद प्रमोद मनोरंजन करके अपनी थकान मिटाते थे और होलिका दहन करके भक्त प्रहलाद और होलिका राक्षसी की कथा का श्रवण करते थे बहुत ही वैज्ञानिक और पर्यावरण की सुरक्षा करने वाला महापर्व है होली वास्तव में प्रत्येक गांव में विशेष स्थान पर रेड का पेड़ या उसकी टहनी बसंत पंचमी के दिन लगाकर फाल्गुन पूर्णिमा के दिन उसके चारों और उपले और जड़ी बूटियां तथा लकड़ियां डालकर शुभ मुहूर्त में अग्नि प्रज्वलित की जाती थी। 

जिसमें तमाम प्रकार के नए अन्य और कपूर तथा वे अन्य औषधियां डाली जाती थी जिससे उसकी सुगंध और दुआ सारे वातावरण में फैल जाए और वातावरण के रोगाणु कीटाणु जीवाणु विषाणु तथा जहरीले पदार्थों का विनाश कर दे ती थी।
होली का पर्व पर रात में अच्छी-खासी ठंड भी रहती है धार्मिक और सामाजिक रुप से संपूर्ण गांव के नर नारी एकत्र होकर होलिका की परिक्रमा करते थे और नए अन्य को भूनकर देवताओं को चढ़ाते थे होलिका के दिन तेल और उबटन लगाने की भी प्रथा परंपरा थी महापर्व होली के तुरंत बाद ही गर्मी की ऋतु शुरू हो जाती थी और 15 दिन के बाद नया भारतीय संवत्सर भी नवरात्रि से प्रारंभ हो जाता था ।

महापर्व होली में रंगों और अश्लीलता की शुरुआत कब से हुई----

 ऐसा माना जाता है कि मुस्लिम आक्रमण के समय देश में हीन भावना घर कर गई थी सनातन धर्म का उत्साह गिर रहा था लेकिन महापर्व होली सभी वर्गों की एकता अखंडता और हिंदू धर्म का बहुत बड़ा स्रोत था और एक बहुत बड़े षड्यंत्र के तहत सनातन धर्म में अश्लीलता और दुराचार फैलाने के लिए मुगल काल से गीले रंगों का प्रयोग शुरू हुआ अकबर के मीना बाजार की चर्चा तो जगत विख्यात है ही अन्यथा इसके पहले अबीर और गुलाल प्राकृतिक फूलों और पत्तियों को मिलाकर उड़ाई जाती थी। 

लेकिन मुगल समाज की तमाम कुरीतियों के साथ होली का गीला रंग तथा मदिरापान  रति क्रिया रास लीला इत्यादि भी जमकर होने लगे और कालांतर में इसमें जुआ खेलने की विनाशकारी प्रथा भी शामिल हो गई।  लेकिन होली का सबसे गंदा भद्दा विकृत अश्लील और गंदा बनाया भारत की फिल्म और उसके नायक नायिकाओं ने तथा भोजपुरी के गंदे दो अर्थी और अश्लील गीतों ने जिस को आवाज देने वाले मनोज तिवारी निरहुआ पवन सिंह अमिताभ बच्चन जैसे लोग भी शामिल रहे

अन्य महान पर्व और होली----

 समाज में सभी का समान प्रतिनिधित्व रहे ऐसा केवल भारत में सुनिश्चित किया गया इसके लिए रक्षाबंधन ब्राह्मणों का विजयादशमी क्षत्रियों का और दीपावली  वैश्योंका और होली शूद्रों का महापर्व माना गया वैसे यह केवल एक विभाजन था जिस तरह प्राचीन काल में लोग अपने गुणों और योग्यता के अनुसार ब्राह्मण और क्षत्रिय हो जाते थे तथा अपने कर्म से गिरने पर चांडाल तथा वैश्य और शूद्र हो जाते थे उसी तरह चारों महापर्व और अन्य सभी सनातन धर्म के व्रत पर्व और त्योहार सभी लोग मनाया करते थे हमारे समाज के व्रत पर्व और त्योहारों ने लाखों-करोड़ों करोड़ों वर्ष से भारत और सनातन धर्म को अखंड अक्षण और एक बनाए रखा जैसे-जैसे हमें धर्म-कर्म व्रत त्यौहार उत्सव में रूचि कम होने लगी वैसे वैसे सनातन धर्म और समाज तथा देश बिखरता और भी नष्ट होता चला गया । 

वर्तमान समय में होली-----

 वर्तमान समय में अधिकांश लोग बेहद गंदी भर्ती अश्लील होली खेलते हैं और नशे का सेवन शराब का सेवन करके मस्त होकर तमाम अश्लील और गलत कार्य करते हैं और जुआ खेलना भी अब इसमें शामिल हो गया है पवित्रताऔर पर्यावरण की प्रतीक वाली वैज्ञानिक होली तो अब देखने को नहीं मिलता है इसीलिए होली के दिन मारपीट हिंसा और हत्या तक हो जाती हैं इसके अलावा समाज में अनेक विकृतियां भी आ गई हैं प्राय देखा जाता है कि विवाह संबंध में दूरी और बिखरा
होली मनाने के साथ ही शुरू होता है और अनेक पारिवारिक दांपत्य जीवन नष्ट हो जाते हैं   गुझीया पकवान हमारे जीवन में मिठास घोल देते हैं और पहले टोली बनाकर पवित्र होली खेली जाती थी लेकिन आज की होली तो बिल्कुल ही अश्लील हो चुकी है

उप संहारसंहार----

 भारत के सभी व्रत पर्व त्यौहार उत्सव और सामाजिक प्रथाएं परंपराएं पूर्ण वैज्ञानिक प्रकृति और पर्यावरण पर आधारित है जिसने सारे देश को लाखों करोड़ों वर्ष में एक बनाए रखा और सनातन धर्म आगे बढ़ता रहा आज जरूरत है कि हम महापर्व होली को सच्चे मन से प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल बनाए रखें और इसमें तमाम कुरीतियाँ शराब जुआ और नशा  भांग दुराचारको पूरी तरह त्याग दें गीले रंगों  डिजल मोबिल मलमूत्र कीचड़का परहेज करें और फूल और पत्तियों से बने हुए अबीर गुलाल से ही होली खेली जाए---- डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम वैज्ञानिक और ज्योतिष शिरोमणि तथा निदेशक अलका शिप्रा वैष्णवी ज्योतिष मौसम और विज्ञान अनुसंधान केंद्र।

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