आधुनिकता की चकाचौंध में विलुप्त होते जा रहे हस्तकला उद्योग - Ideal India News

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आधुनिकता की चकाचौंध में विलुप्त होते जा रहे हस्तकला उद्योग

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Sanjaye Pandey and Manoj Pandey 

मार्टिनगंज आजमगढ़

दुनिया के सभी पर्यावरण विदों का यह मानना है कि यदि हम को पर्यावरण को बचाना है तो गांव को बचाना है गांव तेजी से शहरीकरण की तरफ बढ़ रहे हैं जहां गांव में लगातार सड़क निर्माण एवं अन्य आधुनिक संसाधन बढ़ते जा रहे हैं वही धीरे-धीरे गांव की प्राचीन परंपरा के मुताबिक चलने वाले हस्तकला उद्योग जो पिछड़ी जातियों जनजातियों के लिए जीने का स्रोत हुआ करते थे वह धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं हम यहां कुछ उदाहरण के द्वारा यह समझने का प्रयास करेंगे कि इस आधुनिकता की चकाचौंध में कुछ जाति विशेष हस्तकला व्यवसाय पूरी तरीके से समाप्त होते जा रहे हैं जिन को बचाने के लिए वर्तमान शासन व्यवस्था के पास कोई नीति निर्देश नहीं है और ना ही उनके भरोसे और परिवारों का भरण पोषण संभव है परंतु यह उद्योग कहीं न कहीं मानवता के साथ जीने का संदेश देते थे और लोगों को बीमारियों एवं प्रदूषण से दूर रखते थे, इस श्रेणी में हम सबसे पहले मिट्टी के बर्तनों की तरफ रुख करते हैं आज के समय में आप यह देख सकते हैं कि दीपावली में मिट्टी के दिए से लेकर अन्य कार्य प्रयोजनों में प्रयोग की जाने वाली मिट्टी के बर्तनों में भारी कमी आई है कुम्हार समुदाय अपने इस सनातनी व्यवसाय को छोड़कर अन्य कामों में लग गया है बरदह गांव के राम ब्रिज प्रताप पति से बातचीत करने से या पता चला कि वह मिट्टी के बर्तन तो बनाते हैं लेकिन अब उसे उस तरह के लोग खरीदने वाले ही नहीं हैं उनका कहना है कि इसके लिए जो मेहनत लगती है उसके हिसाब से वह दाम नहीं पाते हैंऔर उनकी अगली पीढ़ी जो उनके नए बच्चे तैयार हुए हैं वह इस काम की मेहनत को देखकर और इसमें लोगों की अरुचि को देखकर इससे दूर रहने का निर्णय ले लिए हैं और आज वैज्ञानिकों ने भी यह सिद्ध करके दिखा दिया है कि यदि मिट्टी के बर्तन में हम किसी भी चीज का सेवन करते हैं तो हमारे लिए स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभप्रद सिद्ध होता है लेकिन इस दिशा में कोई भी आधुनिकीकरण या कोई भी सहायता करने के लिए तैयार नहीं है हालांकि हस्तशिल्प उद्योग जो मिट्टी के बर्तनों को अत्यधिक प्रचार प्रसारित करने का प्रयास कर रहा है उसकी पकड़ अभी उतनी मजबूत नहीं हुई है कि वह गांव क्षेत्र के हर उस हिस्से तक पहुंच सके जहां से उन पात्रों की मदद की जा सके जिससे वे अपने व्यवसाय को आधुनिकीकरण की तरफ मोड़ सकें दूसरा उदाहरण हम वनवासी समाज के लिए उठाना चाहेंगे उनका प्रमुख व्यवसाय पत्तल और दोने का था जो कि पलाश महुआ बरगद आदि वृक्षों से बनाया जाता था आदमियों से बनाया जाता वह पूरी तरीके से नष्ट हो चुका है शादी विवाह में इन पत्रों का विशेष प्रचलन हुआ करता था सभी शुभ कार्य इन पत्रों पर ही किए जाते थे पूजा-पाठ आदि में भी इनका उपयोग होता था परंतु लगातार वृक्षों की कटाई और आधुनिकीकरण की दौड़ में सभी लोग प्लास्टिक एवं थर्माकोल के पत्थरों का एवं दोनों का उपयोग करने लगे जिससे धीरे-धीरे उद्योग पूरी तरीके से नष्ट हो गया बस्ती के लोगों का मानना है कि इसके पहले हमें इस कार्य के लिए बहुत अधिक मान सम्मान देते थे और हम शुभ अवसरों में उनके हाथ जाते थे और इन पत्रों के बदले में हमें पैसा अनाज की प्राप्ति होती थी जिससे हमारे परिवार का भरण पोषण चलता रहता था हम सर्दियों के मौसम में ही इन पत्तों को इकट्ठा करके ढेर सारा स्टॉक जमा कर लेते थे और धीरे-धीरे उनको भेजते रहते थे या पूरी तरीके से पर्यावरण के अनुरूप थे और कोई प्रदूषण भी नहीं होता है लेकिन वर्तमान जीवन शैली के अनुरूप जीने की दौड़ में सभी लोग लगभग इन पत्रों का त्याग कर चुके हैं और वह आधुनिकता की चकाचौंध में प्लास्टिक एवं थर्माकोल के पत्रों को लगातार बढ़ावा दे रहे हैं, अगला उदाहरण हम सिलबट्टी का लेंगे हम यह जानते थे कि आज से लगभग 30 से 40 वर्षों पूर्व तक हमारे यहां का एक अनिवार्य अंग हुआ करता था हुआ करता था परंतु आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में परंतु आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इसका स्थान मिक्सी ने ले लिया है अब मसालों को कूटने के लिए कोई भी सिलबट्टा का इस्तेमाल करने के लिए तैयार नहीं है, तमाम घुमंतू जातियां जिन्हें पटेरा भी कहते थे, आज जैसे वह देखना ही बंद हो गए हैं वह जगह जगह अपना टेंट लगाकर गांव के इर्द-गिर्द लोगों के सिलबट्टा को दुरुस्त करते थे और उन्हें बड़े-बड़े पत्थरों से काटकर नए सिलवटें तैयार कर कर भी देते थे और उसके बदले उन्हें अनाज या पैसे मिल जाते थे जिससे उनका भरण-पोषण होता था परंतु आज सिलबट्टी का इस्तेमाल करने के लिए ग्रहण या तैयार भी नहीं है और ना ही उन पत्थर कट्टो की नई नई पीढ़ियां इस व्यवसाय को अपनाने के लिए तैयार हैं, अगर हम अगला उदाहरण लोहारों का उठाएं तो उनके भी काम में तेजी से कमी आती गई है उनके हाथों से किए जाने वाले कार्य के बदले लोग अब मशीनों से बने हुए हजारों को लेना ज्यादा पसंद करते हैं l
इन तमाम उदाहरणों से यह साबित होता है कि आधुनिकता की चकाचौंध में हम धीरे-धीरे अपने चले आ रहे हस्तकला सनातनी व्यवसाय हूं को नष्ट कर डाले हैं यदि अब हम उनमें नवाचार का प्रवेश कराएं तो हो सकता है धीरे-धीरे फिर से यह व्यवसाय जीवित हो जाएं और लोगों को जीवन यापन का एक नया जरिया मिल जाए , इस खबर का संकलन संवाददाता ने उपरोक्त जातियों से बातचीत करके इकट्ठा किया है l

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