पितामह भीष्म ने मृत्यु के लिए क्यों किया मकर संक्रांति का इंतजार? - Ideal India News

Post Top Ad

पितामह भीष्म ने मृत्यु के लिए क्यों किया मकर संक्रांति का इंतजार?

Share This
#IIN



महाभारत के युद्ध में पितामह भीष्म हस्तिनापुर के सिंहासन के सम्मान के लिए कौरवों की ओर से लड़ रहे थे। युद्ध के दौरान जब अर्जुन ने अपने बाणों से उनको छलनी कर दिया, तो वे बाणों की शैय्या पर कुरुक्षेत्र में काफी समय तक पड़े रहे। उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। ऐसे में उन्होंने तत्काल ही अपने प्राण नहीं त्यागे। उन्होंने मकर संक्रांति यानी सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण होने का इंतजार किया। आखिर पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार क्यों किया? जागरण अध्यात्म में आज हम मकर संक्रांति के अवसर पर इस प्रश्न का जवाब जानते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण की तरह ही पितामह भीष्म को भी समय काल का ज्ञान था। वे जानते थे कि जो व्यक्ति सूर्य के दक्षिणायन अवस्था में प्राण त्यागते हैं, उनकी आत्मा को नरक के कष्ट झेलने होते हैं। उसे स्वर्ग लोक में स्थान प्राप्त नहीं होता है। दक्षिणायन में मरने वाले लोगों की आत्माओं को वैतरणी नदी पार करनी होती है। यमराज उनको किए गए पापों का दंड देते हैं।

पितामह भीष्म ने इसलिए किया सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो लोग मकर संक्रांति यानी सूर्य के उत्तरायण होने के बाद अपने प्राण त्यागते हैं, उनकी आत्मा को स्वर्ग में रहने का सौभाग्य प्राप्त होता है। उसे भगवान विष्णु के दर्शन होने के पश्चात मोक्ष भी प्राप्त होता है। स्वर्ग में स्थान पाने के बाद उसे पृथ्वी पर दोबारा अच्छे कुल और स्थान में जन्म लेने का सौभाग्य मिलता है। इस वजह से पितामह भीष्म ने उत्तरायण के बाद अपने प्राण त्याग दिए। सूर्य देव के उत्तरायण होने के बाद पितामह भीष्म ने माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को अपने प्राण त्याग दिए थे।


No comments:

Post a Comment

Post Bottom Ad