जब देवी सती का भयानक रूप देख इधर-उधर भागने लगे थे शिवजी - Ideal India News

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जब देवी सती का भयानक रूप देख इधर-उधर भागने लगे थे शिवजी

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देवी पुराण के अनुसार, देवी सती के पिता दक्ष प्रजापति ने उन्हें यज्ञ पर आमंत्रित नहीं किया था। जब देवी सती को इस बात का पता चला तो उन्होंने अपने पिता के यहां जाने की जिद्द की। महादेव ने उन्हें का किसी भी शुभ कार्य में बिना बुलाए जाना और मृत्यु, ये दोनों एक जैसे ही हैं। शिवजी ने यह भी कहा कि उनके पिता महायज्ञ में उनका अपमान करने की इच्छा से ही कर रहे हैं। अगर ससुराल में ही अपमान होता है तो वहां जाना मृत्यु से कम नहीं है।

भगवान शिव की बात सुन देवी सती ने कहा कि चाहें आप वहां जाए या नहीं। लेकिन मैं वहां अवश्य जाऊंगी। शिवजी के समझाने के बाद भी देवी सती ने उनकी बात नहीं मानी। इस पर शिवजी ने कहा, "मेरे रोकने पर भी तुम मेरी बात नहीं सुन रही हो। दुर्बुद्धि व्यक्ति स्वयं गलत कार्य कर दूसरे पर दोष लगाता है।" साथ ही यह भी कहा कि अब मुझे पता चल चुका है कि तुम मेरे कहने में नहीं रह गई हो तो जो इच्छा हो वो करोय़ मेरी आज्ञा की प्रतीक्षा क्यों कर रही हो।

महादेव की ऐसी बात सुनकर देवी सती को लगा कि इससे पहले तो शंकर जी ने उनसे ऐसे बात नहीं की है फिर आज क्यों कर रहे हैं। देवी सती ने उन्हें अपना प्रभाव दिखाने के लिए रौद्र रूप धारण किया। क्रोध में वो मां काली बन गईं। भगवती सती को ऐसा देख शंकर जी ने अपने नेत्र बंद कर लिए। बड़ी ही कठिनाई से उन्होंने आंखें खोलीं और भगवती सती का भयानक रूप देखा।

उनका यह रूप देख शंकर जी डर के मारे इधर-उधर भागने लगे। शिव को दौड़ते हुए देख देवी सती ने कही कि डरो मत-डरो मत। लेकिन यह सुनकर उनका डर और बढ़ गया और वो और भी तेजी से भागने लगे। देवी सती अपने स्वामी को भयभीत देख अपने दस श्रेष्ठ रूप धारण कर सभी दिशाओं में स्थित हो गईं। महादेव जहां भी जाते वहां उन्हें भयंकर रूप वाली भगवती मिलतीं। फिर भगवान शिव ने अपनी आंखें बंद कर ली और वहीं ठहर गए।

जब शिवजी ने अपनी आंखें खोलीं तो उनके सामने भगवती काली थीं। शंकर जी ने कहा- श्यामवर्ण वाली आप कौन हैं। देवी सती कहां चली गईं हैं। तब देवीकाली ने कहा कि आप मुझमे स्थित देवी सती को क्या नहीं देख पा रहे हैं। अलग-अलग दिशाओं से आए सभी रूप मेरे ही हैं। इनके नाम काली, तारा, लोकेशी, कमला, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, षोडशी, त्रिपुरसुंदरी, बगलामुखी, धूमावती और मातंगी हैं।

यह सुन शिवजी ने कहा कि मैं आपको पूर्णा तथा पराप्रकृति के रूप में जान गया हूं। आपको मैंने जो भी कहा उसके लिए क्षमा करें। इसके बाद देवी सती का क्रोध शांत हुआ।

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