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आज है ललिता पंचमी

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 पं.जगदीश मिश्र, सीठापुर जौनपुर





हिंदी पंचाग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ललिता पंचमी का व्रत रखा जाता है। इसे उपांग ललिता व्रत भी कहा जाता है। शारदीय नवरात्रि के पांचवे ​दिन अर्थात् पंचमी तिथि को ललिता पंचमी का व्रत किया जाता है। इस दिन 10 महाविद्याओं में से एक ललिता देवी की पूजा की जाती है, जिन्हें त्रिपुरा सुंदरी भी कहते हैं। इनका एक नाम षोडशी भी है। यह सोलह कलाओं से युक्त मानी जाती हैं। नवरात्रि के समय में त्रिपुरा सुंदरी की पूजा करने का महत्व इसलिए भी बढ़ जाती है कि नवरात्रि आदिशक्ति की आराधना का व्रत है, जो महाविद्यायों की दात्री देवी हैं। आइए जानते हैं कि ललिता पंचम का व्रत करने का क्या महत्व है, पूजा का मुहूर्त तथा कथा क्या है।

ललिता पंचमी मुहूर्त

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का प्रारंभ 20 अक्टूबर को दिन में 11 बजकर 18 मिनट से हो रहा है, जो अगले दिन 21 अक्टूबर को सुबह 09 बजकर 07 मिनट तक है। ऐसे में जो लोग नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मंडा की पूजा करेंगे और व्रत रखेंगे, वे साथ ही ललिता पंचमी का भी व्रत रख सकते हैं। ललिता देवी या त्रिपुरा सुंदरी की पूजा पंचती तिथि में करें। आज अभिजित मुहूर्त दिन में 11 बजकर 43 मिनट से दोपहर 12 बजकर 28 मिनट तक है, वहीं, विजय मुहूर्त दोपहर 01 बजकर 59 मिनट से दोपहर 02 बजकर 45 मिनट तक है। इस समय में भी पूजा कर सकते हैं।

ललिता देवी की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु ने पाताल लोक का सर्वनाश करने से लिए सुदर्शन चक्र चलाया था, जिससे उसका ​अस्तित्व खत्म होने लगा। उसके प्रभाव से धरती भी जलमग्न होने लगी। इससे जीव जन्तु के जीवन पर संकट मंडराने लगा। तब ऋषि-मुनियों ने मां ललिता देवी की आराधना की। उनकी स्तुति तथा प्रार्थना से प्रसन्न होकर मां ललिता देवी प्रकट हुईं और पृथ्वी को उस विनाश से बचा लिया। इस तरह से पृथ्वी को एक नया जीवन मिला।

मां ललिता देवी की पूजा

मुहूर्त में मां ललिता देवी की पूजा विधि विधान से करें। उनकी तस्वीर स्थापित कर अक्षत्, पुष्प, धूप, गंध, रोली, मिठाई आदि उनको अर्पित करें। फिर उनके समक्ष अपनी मनोकामना प्रकट कर दें।


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