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जानिए क्यों मनाई जाती है बकरीद, ईद अल-अजहा पर कुर्बानी देने की क्या है मान्यता

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Aqil Jaunpuri






हर धर्म में तीज-त्योहार (Festivals) मनाने की परंपरा होती है. इस्लाम धर्म (Islam Religion) में भी कई त्योहार मनाए जाए हैं जिनमें से सबसे ज्यादा प्रचलित त्योहार ईद (Eid), बकरीद (Bakarid) और मोहर्रम (Moharram) होते हैं. इस बार मुस्लिम धर्म (Muslim Religion) के अनुयायियों का सबसे बड़ा त्योहार बकरीद जिसे ईद अल अजहा (Eid al-Adha) भी कहा जाता है शनिवार (Saturday) को मनाया जाएगा. इस त्योहार के दिन बकरे की कुर्बानी देनी की धार्मिक मान्यता है. इसीलिए मुसलमानों में बकरीद एक प्रमुख त्योहार होता है.
बकरीद को मीठी ईद के करीब दो माह बाद मनाया जाता है. इस इस्लामिक त्योहार (Islamic Festivals) को कुर्बानी देने वाले त्योहार के रूप में मनाया जाता है. यह त्योहार इस्लामिक कैलेंडर (Islamic Calendar) के जु-अल-हिज्ज महीने की आखिरी तारीख को मनाया जाता है. दरअसल, ईद की तारीख चांद का दीदार करने के बाद तय की जाती है. इसलिए इस्लाम धर्म का हर त्योहार आने वाले साल में दस दिन पहले मनाया जाता है. इसीलिए हर तीन साल में मुस्लिम धर्म के हर त्योहार को मनाने का एक महीना कम हो जाता है.
जानिए ईद अल अजहा पर क्यों दी जाती है बकरे की कुर्बानी
इस्लाम धर्म के सबसे बड़े त्योहारों में से एक ईद अल अजहा के दिन सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने की मान्यता है. इस दिन मुस्लिम धर्म के अनुयायी बकरीद की कुर्बानी देते हैं. इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक, हजरत इब्राहिम को अल्लाह का पैगंबर बताया जाता है. इब्राहिम ने अपने पूरे जीवन काल में लोगों के हित के लिए काम किया. अपने जीवनकाल के मुख्य लक्ष्य उन्होंने जनसेवा और समाजसेवा को ही माना था. हजरत इब्राहित की करीब 90 साल की उम्र तक कोई संतान नहीं, लेकिन जब उन्होंने खुदा की इबादत की तो सुंदर सा बेटा इस्माइल का जन्म उनके घर हुआ. इसके साथ ही अल्लाह से उन्हें ये भी संदेश मिला कि इब्राहिम अपनी सबसे प्यारी चीज को कुर्बान कर दो.
अल्लाह के इस हुक्म के चलते उन्होंने अपने सबसे प्रिय पालतू जानवर को कुर्बान कर दिया, लेकिन जब उन्हें फिर से सपना आया तो उन्होंने अपने बेटे को कुर्बान करने का प्रण लिया. उन्होंने खुद की आंख पर पट्टी बांधकर बेटे की कुर्बानी दे दी, लेकिन जब आंख से पट्टी हटाई तो उनका बेटा सही सलामत था और खेल रहा था. अल्लाह के करम से बेटे के स्थान पर बकरे की कुर्बानी हो गई. तभी से बकरे की कुर्बानी देने की परंपरा चली आ रही है और अब ये मुस्लिम धर्म की एक जरूरी मान्यता बन गई है.
कुछ मुस्लिम परिवारों में विशेषकर कुर्बानी के लिए ही बकरे पाले जाते हैं. उसके बाद इन बकरों को बकरीद के दिन कुर्बान कर दिया जाता है. बकरीद के लिए मुस्लिम समुदाय के लोग सुबह ईदगाह में जा कर ईद की नमाज अदा करते हैं और उसके बाद एक दूसरे के गले मिलकर ईद की मुबारकबाद दी जाती है. साथ ही जिन लोगों को कुर्बानी देनी होती है वह बकरे की या किसी अन्य जानवर की कुर्बानी करते हैं. उसके बाद कुर्बानी के बकरे के मीट को तीन भागों में बांट दिया जाता है. एक भाग गरीबों के लिए, दूसरा रिश्तेदारों और तीसरा खुद के लिए रखा जाता है.

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