भारत का सबसे अनोखा गांव, जहां लोगों के घरों का किचन है इंडिया में तो बैडरूम है म्यांमार में - Ideal India News

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भारत का सबसे अनोखा गांव, जहां लोगों के घरों का किचन है इंडिया में तो बैडरूम है म्यांमार में

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क्या आपने किसी ऐसे गांव के बारे में सुना है जहां लोगों के घरों का किचन तो एक देश में हो और उनका बैडरूम दूसरे देश में. शायद ही आपने कभी ऐसा सुना है और आपको लगे कि ऐसा कोई गांव नहीं हो सकता, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत का एक ऐसा गांव हैं जहां लोगों के घरों का किचन तो भारत में पड़ता है और उनका बैडरूम म्यांमार में पड़ता है.
नागालैंड के मोन जिला का लोंगवा गांव भारत का ऐसा गांव है, जिसका आधा हिस्सा भारत में पड़ता है और इसका दूसरा हिस्सा म्यांमार में. यह गांव मोन जिले के घने जंगलों में स्थित हैं और यहां पर कोंयाक आदिवासी रहते हैं, जिन्हें बेहद ही खतरनाक माना जाता है.
लोंगवा के बारे में अनोखी बात यह है कि गाँव के निवासियों के पास दोहरी नागरिकता है- एक भारत की और दूसरी म्यांमार की. म्यांमार की ओर लगभग सत्ताईस कोन्याक गाँव हैं. यह गांव मोन शहर से 42 किमी दूर है. इस गांव के बारे में एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि भारत-म्यांमार सीमा इस गाँव से होकर गुजरती है, जो मुखिया के घर को दो हिस्सों में विभाजित करती है, जिसमें से एक भारत में और दूसरा आधा म्यांमार में है.
लोंगवा गांव के प्रमुख को अंघ भी कहा जाता है और अंघ कई गांव का प्रमुख होता है जिसको एक से अधिक पत्नियां रखने की अनुमति होती है. लोंगवा गांव के मुखिया की 60 पत्नियां हैं और 70 से अधिक गांवों पर वो शासन करता है. लोंगवा गांव के मुखिया के घर के बीचों-बीच से होकर भारत और म्यांमार की सीमा निकलती है.
इतना ही नहीं गांव के कई घरों की स्थिति ऐसी है कि उनके घर का किचन को भारत में पड़ता है लेकिन उन्हें सोने के लिए म्यांमार में जाता है क्योंकि बैडरूम म्यांमार में पड़ता है. इतना ही नहीं इस गांव के कई युवा म्यांमार की सेना में हैं.
लोंगवा गांव में रहने वाले कोंयाक आदिवासी बड़े ही खतरनाक माने जाते हैं. कहा जाता है कि कबीले की सत्ता और गांव पर कब्जे के लिए ये लोग अक्सर पड़ोस के गांव पर कब्जा किया करते थे. साल 1940 से पहले तक ये लोग अपने कबीले पर कब्जे के लिए अपने विरोधियों के सिर काट दिया करते थे और फिर वो खोपड़ी सहेज कर रखते थे. कोंयाक आदिवासियों को हेड हंटर्स भी कहा जाता है.
हालांकि, माना जाता है कि साल 1969 के बाद से ही हेड हंटिंग की घटना इन आदिवासियों के गांव में नहीं हुई. जनजाति के मुख्य लोगों के पास अभी भी घर पर पीतल की खोपड़ी के हार हैं जो कि प्रतीक हैं जो दिखाते हैं कि उन्होंने लड़ाई के दौरान ये सिर काटे हैं. कहा ये भी जाता है सर काटने के पीछे मूल धारणा यह थी कि सिर के शिकार से फसल की उर्वरता बढ़ सकती है.



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