आधुनिक युग में भी उपले की प्रासंगिकता कायम - Ideal India News

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आधुनिक युग में भी उपले की प्रासंगिकता कायम

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Brijbhan vishwakarma and Prem Mohan Agrahari
आजमगढ़ : कभी स्टोव और अब रसोई गैस, सरकार ने ग्रामीण महिलाओं को धुएं से मुक्ति के लिए उज्जवला गैस योजना के तहत घर-घर गैस चूल्हा पहुंचाने का प्रयास किया और काफी हद तक महिलाओं को आराम भी हो गया लेकिन ईंधन के पुराने संसाधन की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है। खासतौर से उपले की मांग गांव से लेकर शहर तक बरकरार है। इसे महसूस किया जा सकता है ग्रामीण क्षेत्रों में उपले का ढेर देखकर। एक ओर गाय-भैंस रखने वालों के लिए यह आमदनी का बेहतर जरिया साबित हो रहा है तो दूसरी ओर गैस में खर्च होने वाले धन की बचत भी हो रही है। अगर किसी ने कभी बाटी-चोखा का आयोजन किया तो भी इसके लिए उपले की जरूरत पड़ती है, क्योंकि भले ही बाटी बनाने का विशेष बर्तन बाजार में आ गया हो लेकिन आज भी उपले की आग में पके बाटी का स्वाद निराला होता है। यह ग्रामीणों के लिए रोजगार का एक साधन भी है। सही रूप से कहा जाए तो गांव से लेकर शहर तक गरीब से लेकर अमीर तक तक उपला जरूरत का एक हिस्सा है।

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